ICAR सुधार संकल्प

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में न्याय की स्थापना हेतु !

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आप अर्थात जनता की अदालत में

 

हमारे देश के जागरूक नागरिकों !

 

      हमारे देश में यह वेबसाइट अपने तरह की एक नई आशामयी शुरुआत है। आप इससे जुडें और इस पर व्‍यक्‍त की गई बातों पर ध्‍यान दें।             यह संपूर्ण सच, न्‍याय, जागरूकता और कर्तव्‍य-बोध एवं दायित्‍व-बोध की भावना से ओत प्रोत है।

 

      जो हमारा है, उसके लिए हम न सोचेंगे तो भला कोई और कौन और क्‍यों सोचेगा ?..........यही मुख्‍य प्रेरणा बीज है इस साइट के आरंभ का।...........आप जुड़ेंगे, आपका जुड़ाव मेरा संबल बनेगा, जो  ICAR को सुधार के पथ पर संपूर्ण निखार तक ले जाएगा। फलत: देश में एक सकारात्‍मक नवोन्‍मेष होगा...........धीरे-धीरे सारा देश जगेगा, हर पथ, हर दिशा, हर संस्‍था में वांछित सुधार होगा और हमारे देश के रूप में,  हमारा अपना ही भविष्‍य विश्‍वपट स्‍वर्णिम आभा से निखर उठेगा।

 

आपका जुड़ाव बने रहने की आशा और आपके विचारों व सुझावों की प्रतीक्षा में

आपकी शुभाकांक्षी

 रमाकान्‍ती दिवेदी

 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में मेरे पति के साथ अन्‍याय हुआ। उन्‍होंने इस अन्‍याय के खिलाफ भरसक संघर्ष किया पर उनकी एक न सुनी गई, उनका प्रयास अंतत: हार गया। मेरे पति ने हार स्‍वीकार ली। उनकी आशा-विश्‍वास व संघर्ष, सारे का सारा व्‍यर्थ हो गया।......अन्‍याय की विजय हुयी और न्याय  सरेआम पराजित हो गया।

न्‍याय के पथ पर न्‍याय के लिए लड़ रहे अपने पति की हार मुझे सहन न हुयी, अत: मैने उनके हारे प्रयास को पुन: जीवित कर, इस बार मैने वही संघर्ष आगे बढ़ाया।

मुझे पूरा विश्‍वास था कि मैं पति की हार को अवश्‍य ही विजय में बदल दूंगी,……… पर क्‍या कहूं ?! कहते हुए दुख भी होता है और आश्‍चर्य भी……सच! अंतत: मैं भी हार गयी।

बात बहुत बड़ी नहीं वरन बहुत छोटी सी है। पर इस बार एक छोटी सी बात, एक छोटा सा अन्‍याय, एक छोटी सी हार मैं सह नहीं पा रही हूं। बड़े-बड़े अन्‍याय सह लेने वाली मैं और मेरा परिवार इस बार एक किंचित सा, नगण्‍य सा अन्‍याय न सह पाया और अंतत: आप सब, अर्थात जनता की अदालत में आ पहुंचा।

जनता की अदालत में आने से पहले हमने वो सारे प्रयास जो न्‍याय के लिए हो सकते थे, सारे के सारे कर लिए। इस पथ अन्‍य जो संभव प्रयास थे उन्‍हें मैं कई कारणों से करना भी नहीं चाहती थी।  इसलिए मैं कह रही हूं कि, मैने सारे प्रयास कर लिए।

आप, अर्थात जनता की अदालत में मैं संस्‍थान, परिषद, सरकार व सुप्रीम कोर्ट से निराश होने के बाद आयी हूं। लोकतंत्र में संविधान की दुर्दशा से आ‍हत हो कर आयी हूं। जनतंत्र में जनवांछा की अनदेखी की पीड़ा से पीड़ित हो कर आयी हूं। न्‍याय की रक्षा के लिए, अन्‍याय के उपचार के लिए एवं लोकतंत्र व संविधान की वास्‍तविक जन सुलभ स्‍थापना के लिए आयी हूं।

मेरा ये प्रयास जितना मेरे लिए महत्‍वपूर्ण है उससे कहीं अधिक संस्‍थान, परिषद, सरकारऔर सुप्रीम कोर्ट के लिए महत्‍वपूर्ण है। क्‍यों कि, मेरी निराशा इन सबकी चूक है।

उक्‍त महानों की चूक वास्‍तव में भारत की चूक है। इसे समझना होगा सभी को और सुधारना होगा इस चूक को। जो हो गया - सो हो गया, उसके लिए यहां मेरा किसी से कोई विवाद नहीं है, पर हाँ! अब आगे ये चूक किसी से न हो, यह आग्रह अवश्‍य है।

अन्‍याय के कारण मैने और मेरे परिवार ने जो दंशा, पीड़ा, निराशा व हताशा भोगी,…….इससे जो हमारी मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक और समाजिक क्षति हुयी। इस बीच जो-जो बुरे विचार मन में आये। जिस नकारात्‍मक ऊर्जा ने जीवन में काला ही काला कर दिया। वो सब किसी और को न सहना पड़े, न भोगना पड़े। अब कम से कम यहाँ  किसी को अंधेरों से घिर, उजाले का सपना छोड़ना न पड़े। इसी वांछा से मैं आप जनता की अदालत में आयी हूं।

ये एक नयी पहल है। वो पहल, जिसे आज से बहुत पहले अर्थात आजादी के तुरंत बाद से हो जाना चाहिए था। पर दुर्भाग्‍य से आज तक भी न हो सकी । आज हो रही है। ये एक बहुत बड़ी बात है। सबको समझना होगा ताकि ये अवसर, ये प्रयास, व्‍यर्थ न हो।

जनतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। जनता ही सरकार चुनती है। जनता ही सरकारों को बनाने बिगाड़ने का कार्य करती है। सारी शक्ति जनता में ही निहित है। इसीलिए जनता की अदालत जनतंत्र की सबसे बड़ी अदालत होती है। इस अदालत के निर्णय को हर कोई मानता है, मानेगा। इसीलिए सबसे निराश हो मैं जनहित के लिए ही जनता की अदालत में आयी हूं।

यहां इस अदालत में कुछ भी कहने से पहले मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं। मेरी बात मेरी ही नहीं सबकी है। आपकी अपनी भी है। अत: मेरी बात पूरे ध्‍यान से सुनें और उसे समझने का यत्‍न करें। इस प्रयास में यदि मुझे आपका सहयोग न मिला तो शायद मैं आपको समझा न सकूं। हां! यदि आप समझने का प्रयास करेंगे, मेरा साथ देंगे, समझना चाहेंगे तो फिर बात इतनी कठिन भी नहीं कि, मैं समझा न सकूं।

मेरी बात पर ध्‍यान दीजिएगा कि, मेरा ये प्रयास, मेंरी ये बात, भारत के चलन बिलकुल नयी है।  पहली बार हो रही है। अत: सब कुछ नया ही नया है। इसलिए अभी इस तरह की बात कहने, सुनने या समझने की परम्‍परा ही नहीं है। इस तरह जो चलन में नहीं है, उसे चलाना है। अभी तक जो नहीं किया, वो करना है। जो नहीं हुआ उसे होना है। इसके लिए आपका पूरा सहयोग चाहिए। हां! कोई दबाव नहीं, कोई आग्रह नहीं।.........आप पूर्ण स्‍वतंत्र रूप से अपने मन-बुद्धि और विवक का प्रयोग कर अपना मत दें। इस साइट पर, बस इतना चाहती हूं। इस साइट पर आपका मत प्रचारित और प्रसारित होगा, उससे जनमत बनेगा। उस जनमत को सरकार का, मीडिया का, न्‍यायालय का, सबका सहयोग मिलेगा और ये प्रयास सार्थक होगा।

आपकी अदालत में सबसे पहले मैं – मीडिया से कुछ कहना चा‍हती हूं। -

प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से !

सबसे पहले मैं आप, लोकतंत्र के अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण चौथे स्‍तंभ को प्रणाम करती हूं। जनतंत्र के सबल रखवाले के रूप में आपको नमन करती हूं। इस प्रयास के रूप में मैं एक ईमानदार पहल कर रही हूं। यह पहल बहुत महत्‍वपूर्ण और आवश्‍यक है। अत इसे सफल बनाने में आप हमारा साथ दें।

आपके साथ के बिना यह पहल अत्‍यंत कठिन हो जाएगी। जो मुझ एक अकेली सामान्‍य महिला के लिए आगे बढ़ाना असंभव नहीं तो भी असंभव जैसी ही हो जाएगी।

मेरा दावा है कि, इस प्रयास को सफल बनाने में आपका सहयोग आपको भी एक संतुष्टि देगा, मान देगा। हां! इस प्रयास हेतु आपको आकर्षित करने जैसे संसाधन मेरे पास नहीं हैं। अत: अपना कर्तव्‍य मान और समझ स्‍वत:  आगे आ हमारा साथ दें। यहां आप मुझ पर विश्‍वास कर सकें इस हेतु मैं कुछ बातें आपसे कहना चाहती हूं। कृपया ध्‍यान दे सुनें, आकलन करें और तब मेरा साथ देने या न देने का निर्णय करें। -

  • आप मीडिया से सरे आम डंके की चोट पर झूठ बोलने का साहस किस में है ?
  • क्‍या कोई बेईमान, संस्‍थान, परिषद, सरकार, सुप्रीम-कोर्ट से निराश हो उनसे आगे जनता की अदालत में आ सकता है ? 

अब यदि इतना संकेत दे कर भी, मैं आपका साथ न पा सकी तो मेरा दुर्भाग्‍य ही और क्‍या कहूं?    पर मेरा ये प्रयास रुकेगा तब भी नहीं हां! एक टीस और बस जाएगी मन में।

किन्‍तु क्षमा करना मुझे, मैं क्‍या कह रही? अपने मन का काला आप पर डाल रही मुझे क्षमा करना। मुझे आपके साथ व सहयोग की जरूरत‍ है, और आशा भी है - विश्‍वास भी, आपका साथ मुझे अवश्‍य मिलेगा।

मेरा यह प्रयास अपने आप में इतना पूर्ण है कि, सचमुच ये परिषद और भारत का भाग्‍य बदल सकता है। वांछित सुधार, जो इतना कठिन लगता है, इस प्रयास द्वारा वास्‍तव में संभव व सरल लगने लगेगा।

आपसे मेरा यह भी कहना है कि मेरा साथ देने के साथ-साथ ही मेरी कमियों को भी सरेआम उजागर करें, ताकि मुझमें भी सुधार हो सके और होता रहे। मैं लोक-परालोक दोनो में विश्‍वास करने वाली और डरने वाली हूं। अहंकार एवं सम्‍मान दोनो से डरती हूं। क्‍यों कि, ये पतन का आरम्‍भ हैं।

मेरी वांछा लोकतंत्र स‍ंविधान नियमादि के अन्‍तर्गत परिषद सुधार की है। यहां मैं यह स्‍पष्‍ट करना चाहुंगी कि, परिषद से मेरा नाता चालीस वर्षों का है। इसे मैं अपना समझती हूं। इसलिए इसमे जो कमी मैने देखी जानी और भोगी है, उसे दूर करना चाहती हूं।

हर हाल में मेरा प्रयास मात्र सृजन है, ध्‍वंस कदापि नहीं। जो हो गया या हो रहा है से भी मेरा टकराव नहीं। क्‍यों कि, मेरी नजरों में सुधार पथ वो व्‍यर्थ है, उलझाने वाला है, सहज नहीं है। मैं तो केवल इतना चाहती हूं कि, जो कमी है वो दूर की जाए, जो गलत है उसे सुधारा जाए। अन्‍याय को उपचारित किया जाए, न्‍याय को बहाल किया जाए।

इस कार्य में मुझे आपका जितना सहयोग मिलेगा, उतनी ही सुगमता से मैं इसे कर सकूंगी। अंत में मैं आप अर्थात मीडिया से इतना कहना चाहुंगी कि, मेरे इस प्रयास में आप तटस्‍थ न रहें, उपेक्षा न करें बल्कि आपकी समझ से जो उचित लगे वो अवश्‍य करें।.......धन्यवाद।

 

मीडिया के उपरांत मैं जनता की इस अदालत में परिषद और सरकार से कहना चाहती हूं –

परिषद (ICAR) एवं (भारत) सरकार से !

मेरा ये प्रयास आप दोनों के हित का ही है, अत: इसे कदापि अन्‍यथा न लें। एक बार पूर्वाग्रह से रहित हो ध्‍यान से देखें, सुनें व समझें। आप दोनों अवश्‍य ही मुझसे सहमत हो जाएंगे।..............और यदि सच कहा जाए तो तभी मेरा ये प्रयास परवान चढ़, नव भारत के निर्माण में सफल सिद्ध हो सकेगा।

आप दोनो पर काम का कितना बोझ है, दायित्‍व हैं, जिम्‍मेदारियां हैं, मैं समझती हूं। पर अपने इस प्रयास को मैने जितना जांचा और परखा है, आकलन किया है, उससे स्‍पष्‍ट रूप से यह सिद्ध है कि, ये कदापि व्‍यर्थ नहीं वरन नवोन्‍मेषी आवश्‍यकतानुसार आज का वांछित वो प्रयास है, जिसे हर हाल होना ही चाहिए।

स्‍वतंत्रता संग्राम के नायकों एवं महानायकों ने स्‍वतंत्र भारत का जो सपना देखा था, सच यह प्रयास उस सपने का आरम्‍भ है।

मैं इस हेतु जितना कर सकती थी, वो किया, आगे जो भी कर सकूंगी, अवश्‍य करूंगी पर यदि इसमें आपका किंचित भी सहयोग व साथ मुझे मिला तो मैं वादा करती हूं कि मात्र एक वर्ष के काल में इसके शुभ परिणाम सबको स्‍पष्‍ट दिखने लगेंगे।

पर मैं अकेली मात्र एक सामान्‍य महिला जिसके पास संसाधनों तक का नितांत अभाव है, वो चाह कर भी कितना कर पाएगी ? ऐसे में यदि ये प्रयास वांछित परिणाम न दे सका तो क्‍या होगा ?  इतना आगे आ यदि मैं हार गई तो संभवत दूसरा कोई इतना भी प्रयास करने का साहस न करेगा। अत: कृपया समुचित ध्यान देने की कृपा करें।